जौ की काश्त
उन्नत किस्में:
बी. एच. 393: समय पर बिजाई के लिए यह किस्म उत्तरी भारत के सभी राज्यों के लिए सिंचित क्षेत्रों के लिए अनुमोदित है। यह मध्यम उचाई वाली छ: कतारों वाली किस्म है। इसके दाने हल्के पीले रंग–रंग के तथा मध्यम आकार के होते है। इस किस्म का छिलका बहुत पतला होता है। यह माल्ट के लिए अति उपयुक्त है। इसकी औसत उपज 20 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म मोल्या तथा पीला व भूरा रतुआ अवरोधी है। यह चेपे रोग के प्रति सहनशील है।
रजत: यह किस्म क्वालिटी हाइब्रिड सीड्स द्वारा विकसित की गई है। यह छः कतारों वाली बौनी तथा कम गिरने वाली किस्म है। तथा उत्तरी भारत के सभी राज्यों के लिए उपयुक्त है। इसके दाने मोटे होते है। इसकी औसत उपज 21 क्विंटल/एकड़ होती है। यह किस्म भी माल्ट के लिए उपयुक्त हैं। पीला रतुआ व पत्तों का धारियों वाला रोग के प्रति रोग रोधी है।
मिट्टीऔर जलवायु: अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी में जौ की फसल अच्छी होती है। बारानी, रेतीली और कमज़ोर ज़मीन में भी यह सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। ठंडी और नम जलवायु जौ की खेती के लिए उपयुक्त होती हैं।
खेत की तयारी: जौ की अच्छी फसल उगाने के लिए समतल खेत की आवश्यकता होती है। खेत में पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद की 3-4 जुताइयां हैरो व कल्टीवेटर से करें। प्रत्येक जुताई के बाद सुहागा लगायें।
बीज की मात्रा: सिंचित स्थितियों में छः कतार वाली किस्मों की अच्छी पैदावार के लिए 35 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ डालें। पछेती बिजाई में 45 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ तथा बारानी स्थितियों में 30 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ डालें।
बीज उपचार: कांगियारी व पत्तों का धारियों वाला रोग से बचने के लिए बीज को 2 ग्राम बाविस्टिन या वीटावेक्स से प्रति किलो ग्राम बीज को उपचारित करना चाहिए।
बिजाई का समय: बारानी क्षेत्रों में जौ की बिजाई अक्तूबर माह के दूसरे पखवाड़े में शुरू कर दें। सिंचित क्षेत्रों में समय की बिजाई 15 से 30 नवम्बर के बीच में कर लें। पछेती बिजाई दिसंबर महीने के आखिर तक कर सकते हैं।
बिजाई की विधि: जौ की बिजाई बीज एवं उर्वरक ड्रिल से करें। बारानी क्षेत्रों में जहां पर भूमि की ऊपरी सतह में नमी की कमी होती है वहां पोरा प्रणाली से बिजाई करें। ठीक समय पर बोई गई फसल के लिए दो खूडों की दूरी 22 सें.मी. तथा देर से बोई जाने वाली और बारानी क्षेत्रों में 18-20 सें.मी का अन्तर रखें।
खाद की मात्रा: सिंचित क्षेत्रों में 50 किलोग्राम यूरिया + 75 किलोग्राम सिंगल सुपर फोस्फेट्स + 10 कि.ग्राम जिंक सलफेट डालें। फास्फोरस तथा आधी नाइट्रोजन की मात्रा बिजाई के समय डालें और बची हुई नाइट्रोजन पहली सिंचाई पर डालें।
सिंचाई: सिंचित क्षेत्रों में जौ की अच्छी फसल उगाने के लिए सिंचाई की संख्या वर्षा के ऊपर निर्भर करती है। बिजाई के बाद साधारणतया 2 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। पहली सिंचाई बिजाई के 40-45 दिन बाद और दूसरी सिंचाई 80 से 85 दिन बाद करें।
खरपतवार नियंत्रण: पहली सिंचाई के बाद एक या दो बार फसल की नलाई करें। यदि ऐसा न कर सकें तो 200-250 लीटर पानी में 400 ग्राम 2,4-डी (सोडियम साल्ट) को घोलकर फसल की बिजाई के 40 दिन बाद प्रति एकड़ छिड़काव करने से चौड़ी पत्ती वाले घास नष्ट हो जाते हैं। यह फसल को कोई क्षति नहीं पहुंचाता।
बिमारियों के लक्षण एवं रोकथाम:
पीला या धारीदार रतुआ: पत्तों पर पीले रंग के छोटे–छोटे धब्बे कतारों में बन जाते हैं। कभी–कभी ये धब्बे पत्तियों के डंठलों पर भी पाये जाते हैं ।
रोकथाम: जौ की रोगरोधी किस्में बोएं। बीमारी के लक्षण आने पर प्रति एकड़ 800 ग्राम जिनेब या मैन्कोजैब को 250 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें। बाद में 10 से 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।
काला रतुआ: लाल या भूरे से काले रंगके लम्बे धब्बे तनों व पत्तियों के डंठलों पर पाये जाते हैं
रोकथाम: बीमारी के लक्षण आने पर प्रति एकड़ 800 ग्राम जिनेब या मैन्कोजैब को 250 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें। बाद में 10 से 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।
खुली कांगियारी: जौ की बालियां काले पाऊडर के रूप में बदल जाती हैं। रोगी पौधों में प्रायः बालियां निकलने से पूर्व सबसे उपरी हिस्सा पीला हो जाता है। यह रोग उत्तरी भारत के सभी भागों व लगभग सभी किस्मों में पाया जाता है।
धारियों वाला रोग: पत्तों पर लम्बी गहरी भूरी लाइनें पड़ जाती हैं बाद में धारियां सारे पत्तों पर फैल जाती हैं। बाद में पत्तें सूख जातें है।
रोकथाम: इस बीमारी की रोकथाम के लिए प्रति एकड़ 600 ग्राम मैन्कोजैब को 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें। बाद में 10 से 15 दिन के अन्तराल पर पुनः छिड़काव करें। रोगरोधी किस्म बोएं। खेत के अन्दर सफाई रखें।
मोलिया रोग: इस रोग से ग्रस्त पौधे पीले व बौने रह जाते हैं। इनमें फुटाव बहुत कम होता है और बालियां छोटी रह जाती हैं। रोगी पौधों की जड़ें छोटी व झाड़ीनुमा हो जाती हैं जिसका सीधा असर फसल की पैदावार पर पड़ता है। जनवरी–फरवरी में छोटे–छोटे गोलाकार सफेद चमकते हुए मादा सूत्रकृमि जड़ों पर साफ दिखाई देते हैं जो इस रोग की खास पहचान हैं।
रोकथाम: रोगग्रस्त खेतों में जौ की अगेती बिजाई करें। सूत्रकृमि की संख्या अधिक व एक समान हो तो कार्बोफ्यूरान (फ्यूराडान-3 जी दानेदार) 13 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से बिजाई के समय देने वाली खाद में मिला कर पोरें व बिजाई करें। जौ की अवरोधी किस्में बी एच 393 व रजत लगाएं।
कीटों की रोकथाम: दीमक की रोकथाम के लिए 100 किलोग्राम जौ के बीज को 600 मि.ली. क्लोरपायरीफॉस 20 ई. से उपचारित करें। इसके लिए पानी में मिलाकर कुल 12.5 लीटर घोल बनायें व उपचार करें।
चेपा व तेला: ये कीड़े फरवरी–मार्च में जौ की पत्तियों और बालियों से रस चूसते हैं। इसकी रोकथाम के लिए 400 मि.ली. मैलाथियान 50 ई.सी. (साइथियॉन/मैल्टाफ/मैलाथियॉन) को 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ फसल पर छिड़कें।
फसल की कटाई: जब पौधे व बालियाँ पीली होने लग जाए तब फसल की कटाई करें। अधिक पकने पर जौ की बालियाँ खेत में गिर जाती हैं।
