सरसों / राया की उन्नत खेती

बिमारियों के लक्षण एवं रोकथाम:

समय पर बिजाई के लिए सिफारिश की गई किस्में: आर एच-30, आर एच-725, आर एच-1424, आर एच-1706, आर एच-1975, आर एच-8812 (लक्ष्मी), वरुणा (टी-59), पुसा बोल्ड ।  

क़्वालिटी सीड्स द्वारा विकसित किस्मे: मोती-87, वैशाली, अभ्य-64  

मिट्टी और जलवायु: राया हर प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है। परंतु उचित जल निकास वाली उपजाऊ बालुई व दोमट मिट्टी राया की काश्त के लिए उपयुक्त होती है। अत्यधिक अम्लीय एवं क्षारीय भूमि इसकी खेती के लिए अच्छी नहीं है। राया मध्यम से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाया जाता है।

खेत की तैयारी: राया की अच्छी पैदावार के लिए खेत अच्छी तरह से तैयार करना जरूरी है ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए। वर्षा ऋतु में नमी संचय व खरपतवार नष्ट करने के लिए एक गहरी जुताई करें। उसके बाद दोतीन आड़ी जुताई करनी चाहिएं। तथा प्रत्येक जुताई के बाद खेत में सुहागा अवश्य लगाएं जिससे नमी बनी रहे। और खेत समतल हो । क्षारीय भूमि में मिट्टी जांच के अनुसार जिप्सम प्रयोग करना चाहिए।

बिजाई का समय: सिंचित क्षेत्रों में 10 से 25 अक्तूबर का समय इसकी बिजाई के लिए सर्वोतम माना गया है। समय पर बोई फसल में कीट, बीमारी व खरपतवार का प्रकोप कम होता है तथा फसल की पैदावार अधिक होती है। पछेती बिजाई 20 नवंबर तक कर सकते हैं। 

बीज की मात्रा: सिंचित अवस्था में राया का प्रति एकड़ एक किलोग्राम बीज काफी है। बारानी हालत में जमीन में नमी के अनुसार 1.5 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ तक प्रयोग करें।

बिजाई का तरीका: सिंचित दशा में राया की फसल कतारों में 45 सें.मी. के फासले पर 4 से 5 सें.मी. गहरी देसी हल से पोरा या ड्रिल विधि से बोई जाती है। पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 सें.मी. रखने के लिए बिजाई के 3 सप्ताह बाद पौधों की छंटाई करते हैं। बारानी क्षेत्रों में सीमित नमी के कारण अधिक पौधे होने से फसल की अधिक पैदावार नहीं होगी। भूमि में पर्याप्त नमी होना आवश्यक है। 

खाद एवं उर्वरक: सिंचित क्षेत्रों में 75 कि.ग्रा। यूरिया व 75 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फासफेट प्रति एकड़ डालें।  यूरिया की आधी मात्रा व सिंगल सुपर फासफेट  की पूरी मात्रा बिजाई के समय प्रयोग करें। इसके साथ ही 10 कि. ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति एकड़ बिजाई के समय डालें। नत्रजन की शेष बची हुई आधी मात्रा पहली सिचाई के समय डालें। फसल में फास्फोरस तथा गंधक की आवश्यकता पूरी करने के लिए सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग करें क्योंकि इसमें 12 प्रतिशत गंधक होती है। यदि फास्फोरस की पूर्ति के लिए डी. . पी. का प्रयोग करना है तो उसमें 2 कट्टे (100 किलोग्राम) जिप्सम प्रति एकड़ की दर से बिजाई से पहले की जुताई के समय या बिजाई पूर्व सिंचाई के समय दें।

जस्ते की कमी के लक्षण व उपचार: जस्ते की कमी के कारण पौधों की वृद्धि मंद पड़ जाती है। कमी के लक्षण बिजाई के 20 दिन बाद पहली सच्ची पत्ती पर आते हैं। पत्तियों का आकार छोटा रह जाता है और किनारे गुलाबी रह जाते हैं। उनकी शिराओं के मध्य में ऊतकों का रंग पीलासफेद या कागजी सफेद हो जाता है जबकि शिरायें हरी ही रहती हैं। पत्तियां नीचे या ऊपर की तरफ प्याले की आकृति ले लेती हैं। अधिक कमी से प्रभावित पत्तियां मर भी जाती हैं। फूल व फली देर से बनती हैं।

भूमि में यदि जस्ते की कमी है तो 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति एकड़ आखिरी जुताई से पहले खेत में बखेर कर जुताई कर दें। खड़ी फसल में कमी के लक्षण दिखाई देने पर 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट और 2.5 प्रतिशत यूरिया का घोल बनाकर 10-15 दिन के अन्तर पर दो स्प्रे करें।

निराई व गोडाई: राया में दो गोडाई बिजाई के तीन व पांच सप्ताह बाद करें। 

सिंचाई: राया की फसल में दो सिचाईयों की आवशकता होती है। पहली सिंचाई फूल निकलने के समय 35-40 दिन बाद तथा दूसरी सिंचाई फलियाँ बनने के समय 75-80 दिनों पर करें।

खरपतवार नियंत्रण

मरगोजा परजीवी खरपतवार: मरगोज़ा ओरोबैंकी परिवार का एक वर्षीय पौधा है जो पूर्णतः परजीवी खरपतवार है और राया की जड़ों से ही पूरी खुराक व पानी लेता है जिससे राया की फसल सूखने लगती है। इसका प्रकोप रेतीली भूमियों में अधिक होता है। तथा राया की फसल के लिए एक भयंकर समस्या बन चुका है। ये बीज सामान्यतः 15-20 वर्ष तक जमीन में पड़े रहने के बाद भी उगने की क्षमता रखते हैं। राया की जड़ें जमाव के 5-7 दिन बाद ओरबैनकोल व एलिकटरोल रसायन छोड़ती हैं जिससे राया की जड़ों के पास पड़े मरगोजा के बीज उत्तेजित होकर उगने शुरू हो जाते हैं। जमाव के बाद यह खरपतवार छोटीछोटी नसों द्वारा राया की जड़ों में घुसकर अपना सम्बन्ध बना लेता है और राया की जड़ों से खुराक व पानी ले कर फसल को नुकसान पहुँचाता है।

मरगोजा का रासायनिक नियंत्रण: मरगोजा (ओरोबैंकी) परजीवी खरपतवार के नियंत्रण के लिए राऊंडअप /ग्लाईसेल (ग्लाइफोसेट 41 प्रतिशत एस. एल.) की 25 मि.ली. मात्रा प्रति एकड़ बिजाई के 25-30 दिन बाद व 50 मि.ली. मात्रा प्रति एकड़ बिजाई के 50 दिन बाद 125-150 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

सावधानी: अगर इस खरपतवारनाशक का सही समय पर व सही मात्रा में उपयोग न किया जाए तो इससे सरसों की फसल को भी नुकसान हो सकता है। इसलिए फसल पर दोबारा ज्यादा मात्रा में छिडकाव न करें।

ध्यान रखें कि छिड़काव के समय या बाद में खेत में नमी का होना जरूरी है। इसके लिए छिड़काव से 2-3 दिन पहले या बाद में सिंचाई अवश्य करें। 

बीमारियों के लक्षण व उनकी रोकथाम:

मृदुरोमिल आसिता (डाऊनी मिल्ड्यू) जब पौधे 15-20 दिन के होते हैं तब पत्तों की निचली सतह पर हल्के बैंगनी से भूरे रंग के धब्बे नजर आते हैं। बाद में ये धब्बे मिलकर बड़े आकार के हो जाते हैं और पत्तियों के सूख जाने से पौधे मर भी जाते हैं। बहुत अधिक नमी में इस रोग का कवक तने तथास्टेग हैड” (विकृत फूलों) पर भी दिखाई देता है। यह रोग फूलो वाली शाखाओं पर अधिकतर सफेद रतुआ के साथ ही आता है।

सफेद रतुआ (व्हाईट रस्ट) पत्तियों के निचली सतह पर चमकीले सफेद उभरे हुए धब्बे बनते हैं। पत्तियों की ऊपरी सतह पीली पड़ जाती हैं जिससे पत्तियों झुलसकर गिर जाती हैं व पौधे कमजोर हो जाते हैं। रोग की अधिकता में ये सफेद धब्बे तने तथा फलियों पर भी दिखाई देते हैं। इस रोग की दूसरी अवस्थास्टेग हैडसबसे घातक है, जिसमें फूल वाली टहनी टेढीमेढी हो जाती है तथा फूल विकृत आकार के हो जाते हैं व फलियां नहीं बनती। नमी रहने पर रतुआ तथा रोमिल रोगों के मिलेजुले धब्बेस्टेग हैड” (विकृत फूलों) पर साफ दिखाई देते हैं।

सामूहिक रोग उपचार :

बीज उपचार: तना गलन रोग के लिये 2 ग्राम कारबेन्डाजिम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें।

छिड़काव कार्यक्रम :

आल्ट्रनेरिया ब्लाईट, सफेद रतुआ या डाऊनी मिल्ड्यू के लक्षण दिखते ही डाइथेन एम-45 का 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव फसल पर दो बार 15 दिन के अन्तराल पर करें।

जिन क्षेत्रों में तना गलन रोग का प्रकोप हर वर्ष अधिक होता है, वहां बिजाई के 45-50 तथा 65-70 दिन के बाद कारबेन्डाजिम का 0.1 प्रतिशत की दर से दो छिडकाव जरूर करें।

सरसों की फसल के मुख्य कीट एवं उनकी रोकथाम

सरसों की फसल के मुख्य कीट एवं उनकी रोकथाम

1. चेपा (माहू/अल): यह कीट हल्के हरेपीले रंग का 1.0 से 1.5 मि. ली. लम्बा होता है। इसके प्रौढ़ एवं शिशु पत्तियों की निचली सतह और फूलों की टहनियों पर समूह में पाये जाते हैं। इसका प्रकोप दिसम्बर मास के अंतिम सप्ताह में (जब फसल पर फूल बनने शुरू होते हैं) होता है व मार्च तक बना रहता है। प्रौढ़ व शिशु पौधों के विभिन्न भागों से रस चूसकर नुकसान पहुँचाते हैं। लगातार आक्रमण रहने पर पौधों के विभिन्न भाग चिपचिपे हो जाते हैं, जिन पर काला कवक लग जाता है। परिणामस्वरूप पौधों की भोजन बनाने की ताकत कम हो जाती है जिससे पैदावार में कमी हो जाती है। कीट ग्रस्त पौधे की वृद्धि रूक जाती है जिसके कारण कभीकभी तो फलियां भी नहीं लगती और यदि लगती हैं तो उनमें दाने पिचके एवम् छोटे ही रह जातें हैं।

नियन्त्रण: समय पर बिजाई की गई फसल (10-25 अक्तूबर तक) पर इस कीट का प्रकोप कम होता है।

दिसम्बर के अन्तिम या जनवरी के प्रथम सप्ताह में जहां इस कीट के समूह दिखाई दें, उन टहनियों के प्रभावित हिस्सों को कीट सहित तोड़कर नष्ट कर दें।

जब खेत में इस कीट का प्रकोप अधिक हो तब 250 से 400 मि.ली. मिथाईल डेमेटान (मैटासिस्टॉक्स) 25 .सी. या डाइमेथोएट (रोगोर) 30 .सी. को 250 से 400 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ कीट ग्रस्त फसलों पर छिड़काव करें । आवश्यकता पडने पर दूसरा छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर करें।

2. चितकबरा कीड़ा या धौलिया कीड़ा: यह कीड़ा काले रंग का होता है जिस पर लाल, पीले व नारंगी रंग के धब्बे होते है। इस कीड़े के शिशु हल्के पीले व लाल रंग के होते हैं। दोनों प्रौढ़ व शिशु इन फसलों को दो बार नुकसान पहुँचाते हैं, पहली बार फसल उगने के तुरन्त बाद सितम्बर से अक्तूबर तक तथा दूसरी बार फसल की कटाई के समय फरवरीमार्च में। प्रौढ़ व शिशु पौधों के विभिन्न भागों से रस चूसते हैं जिससे पत्तियों का रंग किनारों से सफेद हो जाता है, अतः इस कीड़े को धौलिया भी कहते हैं।

रोकथाम: फसल की बिजाई तब करें जब दिन का तापमान लगभग 30 डिग्री सेल्सियस हो जाए। फसल में सिंचाई कर देने से प्रौढ़, शिशु एवम् अण्डे नष्ट हो जाते हैं। बीज को 5 ग्राम ईमिडाक्लोपरिड 70 डब्लयू, एस. प्रति किलोग्गाम बीज की दर से उपचारित करें। फसल की शुरू की अवस्था में 200 मि.ली. मैलाथियान 50 . सी. को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें। मार्चअप्रैल में यदि जरूरत पड़े तो 400 मि.ली. मैलाथियान 50 .सी. को 400 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ फसल पर छिड़कें।

3. बालों वाली सुण्डी (कातरा): इस कीट की तितली भूरे रंग की होती है, जो पत्तियों की निचली सतह पर समूह में हल्के पीले रंग के अण्डे देती है। पूर्ण विकसित सुण्ड़ी का आकार 3-5 सें.मी. लम्बा होता है। इसका सारा शरीर बालों से ढका होता हैं तथा शरीर के अगले व पिछले भाग के बाल काले होते है। इस सुण्डी का प्रकोप अक्तूबर से दिसम्बर तक अधिक होता है। नवजात सुण्डियां आरम्भ में, 8-10 दिन तक, समूह में पत्तियों को खाकर छलनी करती हैं तथा बाद में अलगअलग होकर पौधों की मुलायम पत्तियों, शाखाओं, तनों व फलियों की छाल आदि को खाती रहती हैं जिससे पैदावार में भारी नुकसान होता है।

रोकथाम: जिन पत्तियों पर अण्डे के समूह पाए जाएं उन्हें तोड़कर मिट्टी में दबाकर अण्डों को नष्ट कर दें। इसी तरह छोटी सुण्डियों सहित पत्तियों को तोड़कर मिट्टी में दबाकर अथवा केरोसीन या रसायन युक्त पानी में डूबोकर सुण्डियों को नष्ट कर दें। इस कीड़े का अधिक प्रकोप हो जाने पर 250 मि.ली. मोनोक्रोटोफास या 500 मि.ली. क्विनलफास (इकालक्स) 25 .सी. या 200 मि. ली. डाईक्लोरवास (नूवान) 76 .सी. को 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें।

राया की फसल में पाले का प्रभाव व बचाव: पाला बारानी अवस्था में ज्यादा पड़ता है क्योंकि बारानी जमीन में वायु का तापमान 1-2 डिग्री सेल्सियस कम होता है। यही कारण है कि पाले से बचने के लिए खेत में पानी देने की सिफारिश की जाती है। ऐसा करने से फसल का रात का तापमान 1-2 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहता है।

बचाव: पाले के प्रकोप से बचाने के लिए हल्की सिंचाई करें व आस पास धुआं करें।

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