गेहूं फसल की समग्र सिफारसें
सिफारिश की गई प्रमाणित किस्मे: डीबीडब्ल्यू -187, डीबीडब्ल्यू -222, डीबीडब्ल्यू -303, डीबीडब्ल्यू -327, डीबीडब्ल्यू -372, एचडी-2851, एचडी-2967, एचडी-3086, पीबीडब्ल्यू -343 (उनन्त), पीबीडब्ल्यू -826, पीबीडब्ल्यू -502, राज-3077, राज-3765, राज-4037, राज-1482, सी-306, डब्ल्यू एच-147, डब्ल्यू एच-283, डब्ल्यू एच-711, डब्ल्यू एच-1105, डब्ल्यू एच-1270 ।
क़्वालिटी सीड्स द्वारा विकसित किस्मे: सूर्या, सूर्या-007, फोरचून-1001
मिट्टी व जलवायु: गेहूं विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाया जाता है लेकिन अच्छे जल–निकास वाली मध्यम दोमट, व मध्यम दोमट अच्छी होती है। खारी, कल्लर और सेम वाली भूमि इसके लिए ठीक नहीं है। गेहूं 20-25 सें.मी कम वर्षा से अधिकतम वर्षा (75 सें.मी) तक वाले क्षेत्रों में सफलता पूर्वक उगाई जाती है।
भूमि की तैयारी: गेहूं की अच्छी फसल लेने के लिए खेत में अच्छी नमी व मिट्टी का भुरभुरा होना बहुत ज़रूरी है। सिंचित भूमि में पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद की तीन या चार जुताइयां डिस्क हैरो से करना अच्छा रहता है। अन्तिम जुताई के बाद भूमि में नमी संरक्षित करने के लिए सुहागा लगायें। यदि दो बार हल/हैरो द्वारा जुताई करने के बीच में काफी समय हो तो अच्छी नमी बनाये रखने के लिए हर जुताई के बाद सुहागा लगायें। बिजाई से पहले खेत का समतल होना अति अनिवार्य है। ताकि खेत में पानी खड़ा ना हो।
बीज की मात्रा: समय पर बिजाई के लिए 100 किलोग्राम/हेक्टेयर की दर से बीज डालें। देर से बिजाई करने पर 25 प्रतिशत बीज अधिक मात्रा में डालें। छिड़काव विधि द्वारा समय पर बिजाई करने पर अच्छी पैदावार लेने के लिए बीज की मात्रा 40 की बजाय 50 किलोग्राम प्रति एकड़ व पछेती बिजाई के लिए 60 किलोग्राम प्रति एकड़ प्रयोग करें।
बीज उपचार: गेहूं के बीज को करनाल बंट व कगियारी बीमारियों की रोकथाम के लिए 2.0 ग्राम विटावैक्स/किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें ।
बिजाई का समय: अच्छी पैदावार के लिए गेहूं की बिजाई सही समय पर करें। बिजाई का समय राज्यों के विभिन्न खण्डों की जलवायु पर निर्भर करता है। बारानी इलाकों में गेहूं की बिजाई अक्तूबर के अन्तिम सप्ताह से नवम्बर के पहले सप्ताह तक करें। सिंचित हालातों में बिजाई नवम्बर के तीसरे सप्ताह तक कर सकते हैं। पछेती बिजाई दिसम्बर के तीसरे सप्ताह तक कर सकते है।
बिजाई की विधि: सिंचित क्षेत्रों में गेहूं की बिजाई बीज एवं उर्वरक ड्रिल या केरा विधि से तथा असिंचित क्षेत्रों में पोरा विधि से करें। बीज व उर्वरक ड्रिल की बिजाई से पहले केलिब्रेशन करें। समय की बिजाई के लिए खूड से खूड का फासला 20 सें.मी. रखें, जबकि पछेती बिजाई के लिए दो खूडों की आपसी दूरी 18 सें.मी. कर दें। बीज 5-6 सें.मी. गहराई पर बोएं।
खाद की मात्रा व विधि: सिंचित क्षेत्रों में बोनी किस्मों के लिए 130 किलोग्राम यूरिया 150 सिंगल सुपर फास्फेट व 20 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति एकड़ डालें। आधी नाइट्रोजन, पूरी फास्फोरस, पोटाश व जिंक सल्फेट बिजाई के समय ड्रिल करें। बाकी आधी नाइट्रोजन का पहली सिंचाई के समय छिट्टा दें।
सिंचाई: गेहूं की फसल में 5 से 6 बार सिंचाई करें। पहली सिंचाई बिजाई के तीन सप्ताह बाद अवश्य करें। बाद की सिंचाइयां 20 से 25 दिन के अन्तर पर करें।
खरपतवार नियंत्रण: चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए मेटसल्फ्यूरॉन 1.6 ग्राम/एकड़ या कार्फेंट्राजोन 8 ग्राम/एकड़ को बीज बोने के 35 दिन बाद 100-200 लीटर पानी/एकड़ के साथ छिड़का जा सकता है। घास के नियंत्रण के लिए क्लोडिनाफॉप 24 ग्राम या फेनोक्साप्रोप 40 ग्राम या सल्फोसल्फ्यूरॉन 10 ग्राम/एकड़ का उपयोग बीज बोने के 35 दिन बाद करना चाहिए। जटिल खरपतवार वनस्पतियों के नियंत्रण के लिए क्लोडिनाफॉप और कार्फेंट्राजोन का संयोजन; या मेटसल्फ्यूरॉन के साथ सल्फोसल्फ्यूरॉन को पर्याप्त मिट्टी की नमी पर 30-35 DAS पर लगाया जा सकता है।
रोग एवं कीट नयंत्रण: पीला या धारीदार रतुआ, भूरा या पत्तों का रतुआ, काला या तने का रतुआ, खुली कंगियारी, पत्तों की कंगियारी, करनाल बंट तथा चूर्णी रोग बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचते है। गेहूँ के सूत्रकृमि रोग भी गेहूं की फसल को बहुत नुक़सान करते हैं। अतः इनका नियंत्रण भी अति आवश्यक है। बिमारियों के साथ साथ कीटों की रोकथाम करना भी अति आवश्यक हैं।
बिमारियों के लक्षण एवं रोकथाम:
पीला या धारीदार रतुआ: पत्तों पर पीले रंग के छोटे–छोटे धब्बे कतारों में बन जाते हैं। कभी–कभी ये धब्बे पत्तियों के डंठलों पर भी पाये जाते हैं।
उपचार: पीले रतुए के नियंत्रण के लिए बीमारी के लक्षण नज़र आते ही 200 मिलीलीटर प्रोपिकोनाजोल 25% ई.सी. (टिल्ट 25 प्रतिशत ई.सी.) की 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें। यदि मौसम रोग फैलाने के अनुकूल हो तो इस छिड़काव को 10-15 दिन के अंतराल में दोहराएं।
भूरा या पत्तों का रतुआ: नारंगी रंग के गोल धब्बे बेतरतीब रूप में पत्तियों व कभी–कभी पत्तियों की डंठलों पर बनते हैं जो बाद में काले रंग के हो जाते हैं।
उपचार: इस बीमारी की रोकथाम के लिए 800 ग्राम जिनेब (डाईथेन जैड-78) या मैन्कोजैब (डाईथेन एम-45) को 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़कें। पहला छिड़काव तब करें जब कहीं–कहीं बीमारी नज़र आये। बाद में 10 से 15 दिन के अन्तर से 2 या 3 छिड़काव और करें।
काला या तने का रतुआ: लाल या भूरे से काले रंग के लम्बे धब्बे तनों व पत्तियों के डंठलों पर पाये जाते हैं।
रोकथाम: इस बीमारी की रोकथाम के लिए 800 ग्राम जिनेब (डाईथेन जैड-78) या मैन्कोजैब (डाईथेन एम-45) को 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़कें। पहला छिड़काव तब करें जब कहीं–कहीं बीमारी नज़र आये। बाद में 10 से 15 दिन के अन्तर से 2 या 3 छिड़काव और करें।
खुली कांगियारी: गेहूं की बालियां काले पाऊडर के रूप में बदल जाती हैं। रोगी पौधों में प्रायः बालियां निकलने से पूर्व सबसे ऊपरी पत्ती पीली हो जाती है। यह रोग राज्यों के सभी भागों व लगभग सभी किस्मों में पाया जाता है।
करनाल बंट: रोगग्रस्त दानों में कालेरंग का पाऊडर बन जाता है व इनसे सड़ी मछली जैसी गंध आती है। किन्हीं किन्हीं बालियों में व कुछ दानों पर इस बीमारी का प्रकोप होता है। यह रोग प्रायः प्रदेश के नमी वाले क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है।
रोकथाम: बीजजनित करनाल बंट के बीजाणुओं के लिए बीज का थाइरम 2 ग्राम या टैब्यूकोनाजोल (रैक्सिल-2 डी. एस.) 1 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से सूखा उपचार करें। रोगग्रस्त खेतों में रोगग्राही किस्मों की बिजाई न करें। डब्ल्यू एच 283 व राज 3765 किस्मों में यह रोग कम लगता है।
चूर्णी रोग: पत्तियों पर सफेद यामटमैला चूर्ण–सा बन जाता है। अधिक प्रकोप होने पर बालियां भी रोगग्रस्त हो जाती हैं। यह रोग नमी व सिंचित क्षेत्रों में अधिक होता है।
रोकथाम: प्रति एकड़ 800-1000 ग्राम घुलनशील गंधक का 160-200 लीटर पानी प्रयोग करके छिड़काव करें।
गेहूँ के सूत्रकृमि रोगों के लक्षण एवं रोकथाम
मोल्या: रोगग्रस्त पौधे पीले व बौने रह जातेहैं। इनमें फुटाव बहुत कम होता है और बालियां छोटी रह जाती हैं। रोगी पौधों की जड़ें छोटी व झाड़ीनुमा हो जाती हैं जिसका सीधा असर फसल की पैदावार पर पड़ता है। जनवरी–फरवरी में छोटे–छोटे गोलाकार सफेद चमकते हुए मादा सूत्रकृमि जड़ों पर साफ दिखाई देते हैं जो इस रोग की खास पहचान हैं।
रोकथाम: एक या दो साल के लिए सरसों, तोरिया, चना, गाजर, धनिया, मेथी और जौ की अवरोधी किस्में बी एच 393 को गेहूं के स्थान पर बीजें। रोगग्रस्त खेतों में गेहूं की अगेती बिजाई मध्य–नवम्बर तक पूरी कर लें। सूत्रकृमि की संख्या अधिक व एक समान हो तो कार्बोफ्यूरान (फ्यूराडान-3 जी दानेदार) 13 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से बिजाई के समय देने वाली खादों में मिला कर पोरें व बिजाई करें।
फसल की कटाई: छोटे कद की उच्च पैदावार वाली फसलों की किस्मों की कटाई पत्तों और तने के पीले पड़ने और सूखने के बाद की जाती है। हानि से बचने के लिए फसल की कटाई इसके पके हुए पौधों के सूखने से पहले की जानी चाहिए।
ममनी व टुण्डु: इन बीमारियों से ग्रस्त पौधों के तनों का आधार फूल जाता है और पत्तियों पर टेढ़ी–मेढ़ी सी सलवटें दिखाई देती हैं। ऐसे पौधों की बालियां स्वस्थ पौधों की अपेक्षा छोटी व मोटी रह जाती हैं जिनमें स्वस्थ दानों की जगह काले रंग की ममनियां बन जाती हैं। इनमें हज़ारों की संख्या में सूक्ष्म सूत्रकृमि होते हैं। मौसम में कम तापमान व अधिक नमी के कारण पत्तियों व बालियों पर पीले रंग का चिपचिपा, लेसदार पदार्थ दिखाई देता है। ऐसी बालियां प्रायः मुड़ी हुई तथा बिना दानों की होती हैं।
रोकथाम: ममनी रहित साफ बीज का प्रयोग करें। बीज में यदि ममनी/गेगले वाले दाने हों तो बिजाई से पहले ऐसे बीज को पानी में डाल दें और अच्छी तरह हिलाएं। ममनी हल्की होने के कारण पानी की सतह पर तैरने लगेगी, जिन्हें साधारण छलनी से निकाल कर नष्ट कर दें। बीज को छाया में सुखाकर बिजाई करें।
दीमक: हल्की ज़मीन में कम नमी तथा अधिक तापमान की अवस्था में दीमक बहुत अधिक नुकसान करती हैं। अतः ऐसी भूमि में बीज उपचार करना बहुत ही आवश्यक हो जाता है। 40 किलोग्राम गेहूं के बीज को 60 मि.ली. क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी. या 200 मि.ली. इथियोन 50 ई.सी. (फॉसमाईट 50 ई.सी.) से उपचारित करें।
फसल की कटाई: छोटे कद की उच्च पैदावार वाली फसलों की किस्मों की कटाई पत्तों और तने के पीले पड़ने और सूखने के बाद की जाती है। हानि से बचने के लिए फसल की कटाई इसके पके हुए पौधों के सूखने से पहले की जानी चाहिए।
